मजदूर

—◆◆◆— आहिस्ता आहिस्ता जब शाम ढलती हैमज़दूरों को घर लौटने की तलब लगती है। अंधेरों से रोज उनकी दुआ सलाम होती हैगंतव्य मंजिल सदैव उनकी

…मांझी…

—◆◆◆— आज मांझी बैठा हैं थका हारा जाने किस चोट में किनारे पर है अकेला जाने किस सोच में लहरों के खेल और जल के

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