तुम भी ना ! दिल!

—◆◆◆—


🌟स्वरांजली🌟 शब्दों की गूँज🌟


तुम भी ना ! दिल!

माफ़ करना जवानी !
तू संभल सकती थी
मैंने ही तुझें बहकाया बहुत।

नही दिल !
बहकती तो मैं थी
तुमनें तो मुझें समझाया बहुत।

जवानी! तुमनें सुना
ज़माना क्या कहता है?
– क्या कहता है दिल !

के दिल लग जाता है जब जवानी में
आग लग जाती है तब पानी में।

तुम भी ना ! दिल!
क्यों ज़माने की बात सुनते हो
– क्यों क्या हुआ ज़माने को ?

ज़माना तो है सदियों से दुश्मन जवानी का।
इश्क़ तो खेल ही आग़ और पानी का।

वाह ! क्या ख़ूब कहा जवानी
तुम! भी ना दिल

—◆◆◆—


रचनाकार [{ कवयित्री/कवि }] :- तेजस ‘नीरानन्दन’✍


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