क्षणिक यादों का पिटारा

—◆◆◆—


🌟स्वरांजली🌟 शब्दों की गूँज🌟


क्षणिक यादों का पिटारा ले कर
जी रहे थे अपनी जिंदगी यारो
न चाहत थी न उमंग थी
न किसी की आश थी
न किसे के हम मोहताज थे
तनहाइयां और रुसवाईया
थी कोसों दूर
थे मन मस्त मौजी मस्ताने
न थी दिल की गहराइयों मे
किसी के डूबने की तमन्ना
न प्यार मौहब्बत के अफ़साने
सुनाने सुनने का वक़्त
बस अपनी यादों को समेटे
जीवन का आनँद लेते हुये
एक वेरागी एक संत एक सन्यासी
सा जीवन जी रहे थे
न राग था न रंग था
न मोह था न माया थी
बस सुख था अपरम्पार
जहाँ न बादलों की सीमा रेखा थी
जहाँ न धरती की रेखाओ मे जकड़ा
इंसान था
बस सुख ही सुख था अपरंपार

—◆◆◆—


रचनाकार [{ कवयित्री/कवि }] :- संजय जैन✍


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