”कल्कि”से “कलम”बनी,

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🌟स्वरांजली🌟 शब्दों की गूँज🌟


“कल्कि”से “कलम”बनी,
कलम ही स्त्रोत ज्ञान भंडार,
ढाल बने कभी, कभी बने तलवार,
शब्दबाणों के कटु तीरों से,
करती अराजकता पर वार।

शूरवीर हों या धनवान,
क़लम से कोई नहीं बलवान,
शत्रु-समूह में त्राहि मचाती,
अस्त्र-शस्त्र करती नाकाम|

कोर्ट- कचहरी हो या दफ़्तर,
पत्रकार या सरकारी अफ़सर,
सभी चलाते क़लम निरंतर,|
क़लम बिना ये सब बेजान

कवि ह्रदय के भावों को ,
उमंगो और कल्पनाओं को,
नव आशा पर हो सवार,
क्षितिज के पार ले जाती,
उम्मीदों के दिए जलाती|

—◆◆◆—


रचनाकार [{ कवयित्री/कवि }] :- निवेदिता✍


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