पिताजी…

—◆◆◆—


🌟स्वरांजली🌟 शब्दों की गूँज🌟


पिताजी नाम की शख़्सियत का
हमारे बचपन के ज़माने में
गज़ब का रुआब था…
कुछ पिताजी के हौसले
तो कुछ ज़िंदगी की माकूल
सादगी का कमाल था…

वे चंद कमाए हुए पैसों से
पूरे परिवार की ज़रूरतों को
चुटकियों में समेट लेते थे…
उनके चेहरे के हाव-भाव से
हम अपने अरमानों का
उतार-चढ़ाव तय कर लेते थे…

हम बच्चों का झगड़ा भी
पिताजी के आगमन से पहले
खुद ही सुलझ जाया करता था…
उनके एक के थप्पड़ के
भय से हमारे मनों में फिर से
प्रेम उमड़ जाया करता था…

तब हर छोटी बात पर
पिताजी की अहमियत
उनके रुतबे को बयां करती थी…
ज़िद पर अड़ जाने और
मचलने की हिम्मत भी हममें
कहाँ हुआ करती थी…

नाममात्र की सुविधाएँ भी
तब सच्चा सुकून देने को
बहुत ज्यादा लगा करती थीं …
जब टकटकी लगाए हमारी आँखें
पिताजी के लौटने का
इंतज़ार किया करती थी…

पिताजी के हाथ का वो थैला
जन्नत के ख्वाब-सा हसीन
आफ़रीन लगता था…
जब साइकिल से उतारकर भाई
माँ की रसोई में वो सपनों की
जागीर रखता था…

उन छोटी खुशियों के लिए
हमारे बच्चे अपने पिताजी के
मोहताज नहीं होते अब…
जब जी चाहे चुटकियों में
हमारे बचपन की वो जन्नत
आर्डर कर लेते हैं अब…

तब पिताजी की कमाई से
कभी खाने-पहनने में
कोई कमी नहीं आती थी…
हमारी मनमर्ज़ियाँ भी कभी
अपनी सीमाएँ लाँघकर
दूरतलक नहीं जाती थीं…

मितव्ययता का पाठ जो
उनके किरदार से हमने
अनवरत सीखा है…
आज हर मोड़ पर जीवन के
एक वही कौशल हमारा
अवलंब सरीखा है…

—◆◆◆—


रचनाकार [{ कवयित्री/कवि }] :- काव्याक्षरा✍


© OfficeOfswara.com

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5 comments

  1. ध्रुव सत्य।
    किसी ने कहा है कि शौक तो पिता की कमाई से ही पूरे होते हैं, अपनी कमाई से तो बस जरूरतें पूरी होती हैं

    Liked by 1 person

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