मेरे पिता: मेरी आँखों में सब देख सकता था वो

—◆◆◆—


🌟स्वरांजली🌟 शब्दों की गूँज🌟


हाथ काँधे पे बस एक रखता था वो
मेरी आँखों में सब देख सकता था वो

उस की खफ़गी को कोई भी समझेगा क्या
मैं सँवारता था जब भी बिगड़ता था वो

मैं तना था मुझे उस ने जड़ कर दिया
कोई बरगद सा मुझ को तो लगता था वो

रात खाँसी से उस की खफा हो गया
बारहा मेरी रातों में जागता था वो

है उमीद-ए-कफ़न उसको मुझ से फकत
एक चादर से शब मुझ को ढकता था वो

अब जवानी में सब सच वो लगने लगा
मेरे बचपन में जो जो भी कहता था वो

खुद जो पीने पड़े तब ये खारे लगे
फिर मेरे ये आँसू क्यों चखता था वो

होते राजा नही आज समझा हूँ मैं
मुझे बचपन में राजा सा लगता था वो

मेरी नीदों में कोई खलल ना पड़े
पहरेदारी मैं था वो तो जगाता था वो

उस के हिस्से की खुशियाँ भी मुझ को मिलें
सर खुदा के दरों पे भी रखता था वो

गम भी कैसे करूँ उस को कुछ ना दिया
कुछ उम्मीदें कहाँ मुझ से रखता था वो

कोई सिहरन हुई जब भी सोचा इसे
उफ्फ मेरे वास्ते मर भी सकता था वो

उन दिनो में उसे मैने कुछ ना लिखा
बिन चश्मे के जब पढ़ भी सकता था वो

कोई मुखड़ा रहा था मैं उस के लिए
और मेरे लिए कोई मकता था वो

इस जीवन के सूरज की किरनो तले
किसी गेहूँ की बाली सा पकता था वो

ये भी सच है बड़ा एक ठग भी था वो
मुझ से दुख मेरे आ आ के ठगता था वो

उस के पैरों ने धरती को छोड़ा नही
मेरे सपनो को कांधे पे रखता था वो

मैं जो जीता रहा हूँ यूं बरसों बरस
मेरे सीने में हर पल धड़कता था वो

मेरे दिल में मुझे फिर वो दिखाने लगा
कुछ चिताओं में कब जल भी सकता था वो

हाथ काँधे पे अब तक भी रखता है वो
मेरी आँखों में सब देख सकता है वो

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रचनाकार [{ कवयित्री/कवि }] :- अनिल ‘मासूम शायर’


© OfficeOfswara.com

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