कौओं का लुभाना

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मेरे छत के मुंडेर पर आने वालों कौओं और मुझमें स्वार्थवश एक अलिखित समझौता हुआ है, जिसे मित्रता भी कहा जा सकता है। मैंने अकेलेपन और पक्षीप्रेम के कारण उनकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया और उन्होंने भोजन-पानी की उपलब्धता के कारण। मैं रोज सुबह-शाम उनको रोटी-चावल या जो भी पका होता घर में, देता खाने को। साथ में, मिट्टी के बर्तन में पानी देता।

शुरू में एक कौआ ही आता। शायद दूसरों को कहता होगा “रुको, मैं देख कर आता हूँ, ये कितने पानी में है।” इस बहाने दूसरे कौओं को उल्लू बनाता होगा। फिर अन्य कौवे उसकी चालाकी समझ गए। उसे चारों ओर से घेर कर आने लगे। (राम जाने, सही क्या है? सब तो एक जैसे लगते हैं।)

बहरहाल, इस तरह सबसे दोस्ती हुई। धीरे धीरे उनकी संख्या दस के लगभग हो गई। रोज शाम को मेरे छत की मुंडेर पर मीटिंग करते। खाद्य पदार्थों पर उनका एकाधिकार था। वे खाएं, न खाएं। मजाल है कि गौरैया, मैना, पंडुक (dove) एक टुकड़ा भी खा लें। उनको देखते ही हल्ला करते आ जाते और डरा कर उन्हें भगा देते। पानी भी नहीं पीने देते थे। हल्ला करने के कारण ही हमारी दोस्ती हुई थी। मैं भी बक-बक करने में उस्ताद और कौए भी।

अभी की गर्मी में, आज़ एक नई चीज ही देखने को मिली। आज़ काम वाली बहन नहीं आई। सो मैंने पावरोटी मंगवा लिया था। उसके टुकड़े दिए, कौओं ने नहीं खाया। फिर चावल के दाने, फरही (मुरही), सत्तू सान कर, चावल पकाकर खाने को दिया, मगर लगता था कि भूख हड़ताल किए बैठे हैं। मैं डरा कि निपाह वायरस की तरह का कोई वायरस तो नहीं है जिसका पता चलना मेरी फूटी किस्मत में हो। हर बार कुछ देते ही उनके भीतर नृत्य प्रतिभा जाग जाती और लगते सब के सब भरत नाट्यम, क्रुचिपुडी, कत्थक, ओडिसी, मोहिनी अट्टम इत्यादि करने। मेरी रूह फना। यह हुआ क्या? अभी मैं अपना माथा डर और कन्फ्यूजियाने के चलते खुजा ही रहा था कि देखता हूँ उनमें से एक उड़ा, जाकर हड्डी का टुकड़ा चोंच में दबा कर लाया और (मुझे

दिखा रहा हो मानो, इस तरह) पैरों में दबा चोंच से चोट करने लगा। तब समझ में आया कि आज़ वे सब पार्टी करने के मूड में हैं और मुझे मोह (लुभा) रहे थे।

मैं ठहरा शाकाहारी, कहाँ से लाता?

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रचनाकार:- विश्वजीत प्रसाद सिन्हा

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