कलम की ताक़त

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तुम जो पूछते हो,की क्या कर पाओगे कलम से

तो सुनो

जब हम लिखेंगे तो लिख के तुम्हारे सफ़ेद कपड़ो को हम स्याह कर देंगे।

जिस दिन जद में आये हमारी कलम के
फिर तो हम तुम्हे लिख लिख के ही तबाह कर देंगे।

चाहें तो मशहूर कर दें हम तुम्हें लिख के..
चाहें तो जमाने से तुम्हारा किस्सा ही ख़तम कर दें।

ग़र लिखें हम तो चलती लाश बन जाओ तुम।
ग़र जो थोड़ा और लिखें तो तुम्हें बेकफ़न कर दें।

लिखना चाहें अगर तो बाइबिल रामायण गीता और कुरान लिख दें।

लिखना चाहें अगर तो तुम्हारे खादी से जलता हुआ पूरा हिंदुस्तान लिख दें।

हमें कानून समझकर हमसे खेलने की भूल न करना।

जो हम खेल गए कभी तो उस खेल के सारे कायदे सरेआम लिख दें।

जिन गलियों का आफताब बने फिरते हो तुम,
ग़र चाहें तो तो तुम्हें लिख के उन्हीं गलियों में बदनाम करा दें।

हम लिखें तो दर्ज हो जाओगे तुम इतिहास के पन्नों में
ग़र थोड़ा और लिखे तो लिख लिख के तुम्हारी हस्ती को गुमनाम करा दें।

हम चाहें तो उस रास्ते के पत्थर पे तुम्हारा नाम लिख देें

जो थोड़ा और लिखें तो उस पत्थर को ख़ुदा और तुम्हे उसके मंदिर का दरबान लिख दें।

जिनकी नजरों में फरिश्ते बने फिरते हो तुम,
ग़र हम लिखें तो उनकी नजरों में तुम्हें सौ बार गिरा दें।

जो आज सहिब-ए-मसनद बने बैठे हो हुकूमत में
हम चाहें तो लिख लिख के तुम्हारी सरकार गिरा दें।

हम तो कलम से रिश्ता निभाते हैं।
ग़र वफ़ा की बात आई तो हम तो कलम से ही वफ़ा कर लेंगे।

पढ़ना कभी फुर्सत में हमें
जब तुम्हारे अपने तुमसे दग़ा कर लेंगे।

तब तुम्हें शायद पता चलेगा कि ये कुछ हजार लिखने वाले क्या क्या कर लेंगे।

जिनके घर डूब जाया करते थे फ़ुरसुकूँ दरिया की लहरों से,
आज वो उफनती नदी में
कश्ती उतारने की बात करते हैं।

एक ईंट तो बचा नहीं पाए अपने आशियाने का।
आज वो पूरी विरासत सम्हालने की बात करते हैं।

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